पंचांग शब्द दो संस्कृत शब्दों के योग से बना है — पंच (पाँच) और अंग (हिस्से या शाखाएं)। वैदिक काल गणना प्रणाली में पंचांग कोई सामान्य कैलेंडर मात्र नहीं है, अपितु यह सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्रों की गति पर आधारित एक अत्यंत सूक्ष्म खगोलीय विज्ञान है।
हमारे प्राचीन ऋषियों ने मानव जीवन को प्रकृति एवं ब्रह्मांड की ऊर्जा के साथ सामंजस्य बिठाने के लिए पंचांग के पाँच अंगों का निरूपण किया था।
१. तिथि (चन्द्र दिवस)
चन्द्रमा और सूर्य के बीच के कोणीय अंतर को तिथि कहते हैं। जब चन्द्रमा सूर्य से १२ अंश (12 Degrees) आगे बढ़ता है, तब एक तिथि पूर्ण होती है।
$$\text{तिथि} = \frac{\text{चन्द्र भोगांश} - \text{सूर्य भोगांश}}{१२^\circ}$$
एक चन्द्र मास में कुल ३० तिथियाँ होती हैं:
- शुक्ल पक्ष (१५ तिथियाँ): प्रतिपदा से पूर्णिमा तक, जब चन्द्रमा का प्रकाश बढ़ता है।
- कृष्ण पक्ष (१५ तिथियाँ): प्रतिपदा से अमावस्या तक, जब चन्द्रमा का प्रकाश घटता है।
हिन्दू सनातन परंपरा में जिस तिथि का सूर्योदय के समय प्रभाव रहता है, उसे उदयातिथि कहा जाता है और उसी के आधार पर व्रत एवं पर्व निर्धारित किए जाते हैं।
२. वार (सप्ताह के सात दिन)
एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक की अवधि को वार कहा जाता है। सप्ताह के सातों दिनों के अधिपति अलग-अलग नवग्रह हैं:
- रविवार: सूर्य देव का दिन — यश, सम्मान, प्रशासनिक कार्य।
- सोमवार: चन्द्र देव का दिन — शांति, जल, माता का आशीर्वाद, ध्यान।
- मंगलवार: मंगल देव का दिन — शौर्य, भूमि, साहस, पराक्रम।
- बुधवार: बुध देव का दिन — बुद्धि, व्यापार, गणित, संचार।
- गुरुवार: देवगुरु बृहस्पति का दिन — ज्ञान, धर्म, विद्या, आध्यात्मिक उन्नति।
- शुक्रवार: शुक्र देव का दिन — कला, सौंदर्य, सुख-समृद्धि, वाहन।
- शनिवार: शनि देव का दिन — न्याय, कर्म, सेवा, संयम।
३. नक्षत्र (चन्द्र मंडल के २७ तारे)
भचक्र के ३६० अंशों को २७ बराबर भागों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक भाग १३ अंश २० कला ($13^\circ 20’$) का होता है, जिसे नक्षत्र कहते हैं।
प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते हैं। अश्विनी, रोहिणी, पुष्य, हस्त, स्वाती, अनुराधा और रेवती जैसे नक्षत्र शुभ कार्यों के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माने जाते हैं।
४. योग
सूर्य और चन्द्रमा के स्पष्ट भोगांशों के योग को योग कहा जाता है।
$$\text{योग} = \frac{\text{सूर्य भोगांश} + \text{चन्द्र भोगांश}}{१३^\circ २०’}$$
कुल २७ योग होते हैं (विष्कम्भ से लेकर वैधृति तक)। इनमें आयुष्मान, सौभाग्य, सुकर्मा, धृति, सिद्धि आदि योग मांगलिक कार्यों में शुभता प्रदान करते हैं।
५. करण (तिथि का आधा भाग)
एक तिथि के आधे भाग (६ अंश) को करण कहा जाता है। एक मास में ६० करण होते हैं।
- ७ चर करण: बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज एवं विष्टि।
- ४ स्थिर करण: शकुनि, चतुष्पाद, नाग एवं किंस्तुघ्न।
चर करणों में सातवां करण विष्टि (भद्रा) कहलाता है। भद्रा काल में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे शुभ कार्य पूर्णतः वर्जित माने जाते हैं।
निष्कर्ष
पंचांग के इन पाँच अंगों का सटीक ज्ञान व्यक्ति को प्रकृति की लय के साथ जीने, शुभ अवसरों का चयन करने और अनावश्यक बाधाओं से बचने का सुदृढ़ मार्ग प्रशस्त करता है।